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कावड़ यात्रा

17 वर्ष पूर्व छोटे से रूप में प्रारंभ हुई बाणेश्वरी कावड़ यात्रा ने लिया भव्य रूप संयोजक गोलु शुक्ला के अथक प्रयास से हजारों कावडि़ए पहुँचते हैं महाकाल का अभिषेक करने

सावन के महीने में कावड़ यात्रा का विशेष महत्व है। सावन महादेव को काफी प्यारा है, इसीलिए इस महीने के आरंभ से ही लाखों की संख्या में लोग कावड़ यात्रा पर निकलते हैं। फिर शुद्ध जल से अपने ईष्ट देव का जलाभिषेक कर यात्रा पूरी करते हैं।

पुराणों में कहा गया है कि समुद्र मंथन के दौरान हलाहल (विष) निकला था उस समय पृथ्वी पर जीव-जंतुओं की रक्षा के लिए देवाधिदेव महादेव ने उस हलाहल को अपने कंठ में धारण कर किलया जिससे उनके शरीर में नकारात्मक ऊर्जा फैलने लगी, जिसे शांत करने के लिए परम शिव भक्त रावण ने कावड़ में गंगा जल भरकर भगवान शिव का अभिषेक किया, जिससे वे प्रसन्न हुए। माता आदिशक्ति ने मनचाहा फल पाने के लिए भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कावड़ चढ़ाई। भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में कावड़ से जलाभिषेक करने से कोटि यज्ञ फल प्राप्त होता है तथा आर्थिक, मानसिक तथा शारीरिक कष्ट दूर होते हैं।

श्रावण मास के दौरान महेश्वर से उज्जैन के लिए निकलने वाली बाणेश्वरी कावड़ यात्रा लगातार 17 वर्षाें से जारी है। मात्र कुछ यात्रियों को लेकर प्रारंभ हुई इस कावड़ यात्रा ने आज भव्य रूप ले लिया है। इसका पूरा श्रेय बाणेश्वरी कावड़ यात्रा संघ के संयोजक गोलू शुक्ला को जाता है, जिनके अथक प्रयास एवं भगवान महाकाल के प्रति आस्था ने इस भव्यता प्रदान की। श्री शुक्ला कावड़ यात्रा प्रारंभ होने से लेकर समापन तक यात्रियों के साथ कंधे से पर कावड़ लेकर चलते हैं तथा यात्रा में शामिल सभी यात्रियों का विशेष ध्यान रखते हैं। कावड़ यात्री को किसी प्रकार की कोई परेशानी या समस्या नहीं होने देते। 22 जुलाई से महेश्वर से प्रारंभ हुई बाणेश्वरी कावड़ यात्रा में हजारों कावड़ यात्री माँ नर्मदा के जल से भगवान महाकालेश्वर का जलाभिषेक करने पहुँचे। श्री गोलू शुक्ला ने बताया कि 17 वर्ष पूर्व ब्रह्मलीन श्री सुरेन्द्रकुमार शुक्ला (काकाश्री) की प्रेरणा से प्रांरभ की गई। मात्र सौ-सवा सौ कावड़ यात्रियों के साथ प्रारंभ हुई यात्रा ने आज भव्य रूप ले लिया है। आज हजारों श्रद्धालुओं के साथ महेश्वर से महाकालेश्वर तक निकलने वाली इस कावड़ यात्रा में इंदौर ही नहीं महेश्वर, महू, राऊ सहित आसपास के क्षेत्रों के कावड़ यात्री भी शामिल होकर पुण्यलाभ अर्जित कर रहे हैं। श्री शुक्ला ने बताया कि 17 वर्ष पूर्व कावड़ यात्रा के संबंध में कोई ज्यादा नहीं जानता था क्योंकि उस वक्त कोई कावड़ यात्री अभिषेक करने नहीं पहुँचते थे। वर्ष 2002 में जब यात्रा शुरू हुई थी उस दौरान कुछ ही श्रद्धालु कावड़ यात्रा में शामिल हुए थे, तब जिस मार्ग से भी यह कावड़ यात्रा निकलती थी तो लोग बड़े उत्सुकता से उन्हें देखते थे और प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे कि यह भगवा वस्त्र पहनकर युवा कावड़ लेकर कहाँ से आए हैं और कहा जा रहा है। लोगों को कावड़ के संबंध में कोई जानकारी नहीं थी। जब भगवाधारी युवा कावड़ कंधे पर लटकाकर निकलते थे तो लोग उन्हें अजीब सी नजरों से देखते थे, कुछ वर्षाें तक तो कावड़ यात्रा में 100-200 यात्री ही शामिल हुए, लेकिन धीरे-धीरे लोगों में जागरूकता आई तथा भगवान शिव के प्रति आस्था बढ़ी। और देखते ही देखते श्रावण मास के दौरान महाकालेश्वर के अभिषेक के लिए युवाओं के साथ-साथ महिलाएं एवं वरिष्ठ लोगों का भी रूझान बढ़ने लगा। महेश्वर से उज्जैन तक 175 किलोमीटर की इस कावड़ यात्रा में आज हजारों श्रद्धालु शामिल होते हैं। यात्रियों के स्वागत के लिए जगह-जगह स्वागत मंत्र बनाकर पुष्प वर्षां कर स्वागत किया जाता है। यात्रियों के भोजन, नाश्ता, चाय विश्राम आदि की व्यवस्था भी आमजन द्वारा ही की जाती है। भगवान शिव के प्रति आस्था का फल है कि आज इस कावड़ यात्रा ने भव्य रूप ले लिया है। श्री शुक्ला ने बताया कि कावड़ यात्रा का मुख्य उद्देश्य देश में शांति स्थापित करना, देश तरक्की करें, उन्नति के शिखर पर पहुँचे, भारत विश्व गुरू बने तथा यात्रा में शामिल श्रद्धालुओं की मनोकामना पूर्ण हो। आज यह स्थिति है कि महेश्वर से प्रारंभ होने वाली इस कावड़ यात्रा से युवाओं में धर्म के प्रति आस्था बढ़ी । दूर-दूर से हजारों कावड़ यात्री महाकालेश्वर मंदिर पहुँचकर बाबा महाकाल का अभिषेक कर रहे हैं। यहीं कारण है कि अब श्रावण मास के दौरान इंदौर-उज्जैन मार्ग पर कावडि़यों का दल आकर्षक कावड़ के साथ महाकाल मंदिर की ओर बढ़ते नजर आ जाते हैं।

महाकाल के अनन्य भक्त गोलु शुक्ला

भगवान महाकालेश्वर के अनन्य भक्त गोलु शुक्ला हर कार्य की शुरूआत भगवान महाकाल के दार्शन से करते हैं। यहीं कारण है कि वे हर बार नए वर्ष की शुरूआत भस्मारती दर्शन के साथ करते हैं। श्री शुक्ला के अनुसार नव वर्ष पर भगवान महाकालेश्वर के दर्शन से नई ऊर्जा प्राप्त होती है तथा पूरा वर्ष आनंदमय बना रहता है। काम करने की शक्ति मिलती है। श्री शुक्ला ने बताया कि धार्मिक नगर उज्जयिनी में भगवान महाकालेश्वर, माँ क्षिप्रा, चिंतामण गणेश, माँ हरसिद्धि, कालभैरव आदि विराजमान है। यह सभी धार्मिक आस्था का प्रतीक है। महाकालेश्वर के साथ-साथ काल भैरव मंदिर भी विश्व में प्रसिद्ध है। दुनिया का कोई ऐसा साईंटिस्ट नहीं है जो भगवान काल भैरव को चढ़ने वाली शराब का पता लगा सके कि वह जाती कहाँ है। यह एक चमत्कार नहीं तो और क्या है। श्री शुक्ला ने बताया कि उज्जैन भगवान महाकाल की नगरी है। यहां सिंहस्थ के दौरान विकास कार्य होते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि महाकाल की नगरी में प्रतिवर्ष विकास कार्य चलते रहना चाहिए। उज्जैन में भारत वर्ष से ही नहीं विदेशों से भी बड़ी संख्या मेें श्रद्धालु बाबा महाकाल के दर्शन हेतु पहुँचते हैं। यह एक धार्मिक नगरी है, यहाँ अगर विकास होगा तो पर्यटन के क्षेत्र में भी उन्नति होगी। बाणेश्वरी कावड़ यात्रा संघ का हमेशा प्रयास रहता है कि उज्जैन के विकास में सहभोगी बने।